रंगमंच कोई नई उत्तेजक विधा है नहीं
इसका इतिहास तो वक़्त के अँधेरे में गुम है
जो जितना प्रमाणिक जानता है
वह उतनी ही अनोखी बातें करता है
कुछ रूढ़ि की होती हैं
कुछ परम्परा की
कुछ शैली की
कुछ प्रयोग की
यहाँ जो विधान की बात करते हैं
वे तत्व विवेचन में नहीं फंसते है
जालसाजों की जमात कहाँ नहीं
रंगमंच उनसे पोषित नहीं होता
रंगमंच, लोकधर्मी आस्था का नाट्यधर्मी विधान है
लोकधर्मिता उसे समसामयिक बनाती है
यहाँ संयत तो रहना ही चाहिए
उत्तेजना का दारोमदार
दूसरी छद्म विधानों ने बड़ी कुशलता से जरूर ले लिया है
उन शक्तिशाली और प्रभावी माध्यमों से प्रतियोगिता
बेबकूफी ही होगी
रंगमंच ऐसा करता भी है
वह अपने सीमित दायरे में अपनी विशिष्ट कथनी को लेकर
सामाजिक अनुष्ठान का उपाय करता है
जहाँ एक मानवीय गतिविधि नियोजित की जाती है
लोकधर्म के निमित्त
चाक्षुस लोकधर्म
प्रुस्तुत सोच का
कथन का
ये कहना लिखित होता है
अलिखित भी , स्मृति भी , विचार भी
एक ख्याल भी कहा जा सकता है
प्रयोगधर्मी को खुद सबसे पहले
इसे ही तय करना पड़ता है
ज़्यादातर मामलों में तो रंगमंच की सोच आते ही
किसी आलेख का दामन पकड़ना पड़ता है
कुछ दु:स्साहसी तो कूद पड़ते है कि एक्सपेरिमेंट करेंगे
कर भी डालते हैं
वे आलेख की बात नहीं करते
अपनी बजाते है
कुछ इस जरिए भी
अपनी विकट रचनात्मकता से
कमाल करते हैं
कुछ धमाल करने के चक्कर में माल परोसते हैं
वो करते तो हम क्यूँ नहीं ?
धसोरने का ख्याल और उत्तेजना
मंच को फाड़ डालने का साहस उनको देती है
वे सब कुछ तोड़ डालने को बेचेन
मल्टीकलर ऑब्जेक्ट थिएटर का सब्जेक्ट सुपरइम्पोज़ करते हैं
उनका रंगमंच
अपने दर्शकों के लिए अजब ग़ज़ब
लक्षित समुदाय के लिए गुड होता है
विषय और वस्तु का जहाँ सम्मिलन होता है
वहां तो प्रयोग बहस में शामिल होता है
वरना आत्ममुग्धता की बंडलबाजी
एक्सपोर्ट मटेरियल
रंगमंच के आकर्षक एक्सपोर्ट मटेरियल होने का भी मोह गाफिल है
कुछ फैक्ट्री देखे जा सकते हैं
अनुभवी को क्या कहें
अबोध को क्या कहना
सेल्समैन को क्या कहना
उसका माल दुनियां का आठवां अजूबा तो होता ही है
मो सम कोऊ ना भाई
रंगमंच के आधार के रूप में आलेख की अभी भी बड़ी प्रतिष्ठा है
पर आलेख मंचन नहीं होता
उसपर आधारित प्रस्तुति मंचित होती है
प्रस्तुति में शब्द जीवंत कहे जाते हैं
आलेख के शब्द वही नहीं रहते
जो नाटककार भाषाई रूप में संयोजित करता है
वे एक अनुबंध की तरह
संयमित करते हैं दिशा और कथ्य को
उनमें संभावनाएं तलाशी अच्छी है
उनपर अपनी उबासी ठीक नहीं
रचनात्मकता का दारोमदार
आलेख और प्रयोगकर्ता के साथ परस्पर मुखामुख होता है
आलेख आम तौर पर निरपेक्ष और सादर रहती है
यही भाव वह प्रयोगकर्ता से चाहती है
रूपमय होना चाहती है
संवाद होना चाहती है
विवाद होना चाहती है
भाव से भरपूर महसूस होकर सामना करना चाहती है
आमंत्रित रसिकों का
ये क्षण पाने के लिए
प्रयोग के विकट दौर से होकर गुजरना पड़ता है
अब इन लम्हों को स्मृति के अलावा
डिजिट में हुबहू संरक्षित तो किया जा सकता है
पर प्रयोगकर्ता अपनी धारणाओं को ज़्यादा वज़न देता है
वह बंदर और कुशल शिल्पी कहलाने से बेहतर
हिम्मती और मौलिक कहलाना ज्यादा पसंद करता है
नाटक के सफ़ल वक्ती वज़ूद को देखा जा सकता है
जब चाहें तब
पर प्रयोगधर्मी पढना चाहता है
अपने मन की आँखों से देखना
अपने मन, अपनी आत्मा को सुनना चाहता है
आंदोलित होना चाहता है
नवांकन करना चाहता है
उत्तर आधुनिक होने का दवाब कहता है
अशुद्धता, देवता, खुदा, पैगम्बर सब बेमानी है
फ़रेब है सब स्थापनाएं
तो फिर ये शब्द कैसे वही हैं जो कल थे
ये अभंग नहीं भंग-भंग दर्शन का काल है
रूढ़ीगत ढांचा तोड़ो
तोड़े सब मिल कर
पर क्या हम जानते है
कहाँ हम उत्तर है
कहाँ आधुनिक और कहाँ पूर्विक
सवाल तो है ...
जितने प्रमाण जिसे जुटते है
.....
हाँ हम सादर
जीवंतता और अनुभूति की नई चुनोती ज़रूर दे सकते हैं
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